बुधवार, 26 जून 2013

जानिए! मोदी की सीक्रेट प्लानिंग का राज, लगी थीं 80 इनोवा, 27 बसें-4 जहाज!

अहमदाबाद। एक मुखिया, लंबा कारवां, 15 हजार लोग.. 80 इनोवा, 4 हवाई जहाज और 25 लक्जरी बसें.. ये किसी बारात या शादी की तैयारियों का नजारा नहीं है। और न ही ये किसी बड़ी शख्सियत द्वारा दी गई पार्टी का बखान है.. अब आप सोच रहे होंगे कि अगर ये नहीं तो फिर क्या है...।
दरअसल, ये शुक्रवार 21 जून की शाम और शनिवार 22 जून के बीच का मामला है। शाम का समय था.. एक के बाद एक गाड़ियों की लाइन और देर रात तक चली बैठक। फिर 15 हजार लोगों के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन।

मामला जुड़ा है नरेंद्र भाई मोदी से, जिन्होंने उत्तराखंड से चंद घंटों में ही 15 हजार गुजरातियों को निकाल अपने घर सुरक्षित पहुंचा दिया। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर ये सब कैसे हुआ.. तो इसका जवाब है एक गुप्त प्लानिंग। 

बताया जा रहा है कि मोदी ने बुधवार को देर रात तक अपने अधिकारियों व मंत्रियों की आपात मीटिंग बुलाई। यह मीटिंग देर रात चली। इसके लिए तुरंत कुछ अधिकारियों को उत्तराखंड स्थिति का जायजा लेने के लिए भेजा गया और उनसे हर मिनट और हरेक स्थिति की जानकारी देने के लिए कहा गया। 

उत्तराखंड पहुंचे अधिकारी इसकी रिपोर्ट गुजरात में बैठे अधिकारियों को देते रहे और गुजरात में रेस्क्यु का पूरा प्लान बनता रहा।

प्लानिंग के बाद 80 इनोवा, 4 बोइंग और 25 लक्जरी बसों का इंतजाम कर तत्काल उत्तराखंड रवाना कर दिया गया।
इतना ही नहीं, शुक्रवार की रात देहरादून पहुंचते ही मोदी ने बिना किसी देरी से जौली ग्रांट एयरपोर्ट पर बैठे करीब 134 गुजराती यात्रियों को अपने चार्टर्ड प्लेन से अहमदाबाद भी रवाना कर दिया था। मोदी की इस कार्रवाई की भी किसी को भनक तक नहीं लग पाई।
यह भी कहा जा रहा है कि मोदी ने टिहरी में फंसी एक गुजराती श्रद्धालु की कार को निकालने के लिए एक आईएएस अधिकारी को तुरंत वहां भेज दिया था।
ये टीम लेकर पहुंचे:

उल्लेखनीय है कि मोदी शुक्रवार को रात के समय अचानक ही देहरादून पहुंचे थे। बताया जाता है कि वे यहां अकेले नहीं, बल्कि अपनी पूरी रेस्क्यु टीम को लेकर पहुंचे थे। मोदी की इस टीम में 5 आईएएस , 1 आईपीएस, 1 आईएफएस, 2 डीएसपी और 5 पुलिस इंस्पेक्टर व 2 गुजरात प्रशासनिक सेवा के आला अधिकारी भी शामिल थे। मोदी की इस तात्कालिक कार्रवाई को देखते हुए मीडिया में मोदी को रैंबो’, ‘सुपरमैन’, जैसी उपाधियों से नवाजा गया। क्योंकि मोदी दो दिनों के भीतर ही अपनी स्टाइल से कांग्रेस की विजय बहुगुणा सरकार को चिढ़ा हुए निकल भी गए।


अब इसी बात को लेकर राजनीतिक घमासान मच गया है और राजनीतिज्ञों के बीच वाद-विवाद का दौर भी शुरू हो गया है। दूसरी तरफ, उत्तराखंड सरकार ने भी इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अब कोई भी राज्य सरकार अपने तरीके से बचाव कार्य नहीं कर सकेगी।

उत्तराखंड सरकार के इस फैसले से अब वहां फंसे बाकी लोगों की मुसीबतें बढ़ गई हैं, क्योंकि बचाव कार्य में किसी भी रूप में शामिल होने के लिए अन्य राज्य सरकारों को उत्तराखंड सरकार से इजाजत लेनी पड़ रही है।

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

Liveaaryaavart.com : India, Business, Bollywood, Cricket, Video and Breaking News

सुप्रीम कोर्ट तक दोषी साबित होने के बावजूद "न्यायाधीश" (?? क्या वाकई?) मार्कंडेय काटजू साहब, संजू बाबा को माफ करना चाहते हैं. - जबकि केन्द्र सरकार द्वारा अपने सारे "डॉगी" छोड़ने के बावजूद नरेंद्र मोदी पर एक केस भी नहीं है, फिर भी सभी "महानुभावों", सभी "माननीयों", सभी "बुद्धू जीवियों" की निगाह में वे दोषी ही हैं.
अरे भारतवासियों  फ़िल्मी दुनिया में नाचने वालो / भांडों की कमी नहीं है,  भोगने दो अपने कुकर्मों का फल इस भांड को- चोली के पीछे क्या है' इसका बखान करने के अलावा देश के लिए क्या योगदान है इस नचनिये का? 

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

दिल्ली बस बलात्कार काण्ड


घर से दूर दिल्ली में पढ़ने वाली लड़की का अपने यार के साथ सिनेमा देखकर आधी रात को लौटते समय बस में मौजूद गुंडों द्वारा बलात्कार.

      यह समाचार पाकर बलात्कार करने वालों के प्रति मुझे अत्यंत क्रोध और पीडिता के प्रति सहज करुणा सहानुभूति उत्पन्न हुई। इस अपराध के लिए विधि द्वारा निश्चित वर्तमान  दण्ड पर्याप्त है। अतिउत्साही गधे पता नहीं क्यों फांसी-फांसी चिल्ला रहे हैं?  सवा अरब नागरिकों वाले देश में नित्य इससे कहीं अधिक जघन्य अपराध हो रहे हैं। क्या दिल्ली से दूर होने वाला अपराध इंडियन पीनल कोड के अनुसार अपराध नहीं, अल्पवयस्क बच्चियों के साथ दुराचार पर तो इनका खून कभी नहीं खौलता दिखाई दिया? खबरिया चैनलों को उनकी कोई परवाह है? असलियत यह है भाई साब! कि दूर-दराज की खबरें तलाश करने में संसाधन चाहियें, मेहनत करनी पड़ती है, खर्चा होता है। इसलिए दिल्ली/ एन सी आर में जितनी अधिक विभत्स और जघन्य घटना घटती है, मीडिया की बांछे खिल जाती हैं, सौभाग्य से बिना खर्च, घर के बिलकुल पास ऐसी न्यूज हाथ हाथ लगी है कि दो-तीन दिन की नौकरी इसी को जुगालते पूरी हो जायेगी  (कृपया गौर करें कि समाचार कितना भी दुखद क्यों न हो, पर वर्णन करते समय खबरिया चैनल के वाचक के स्वर में कितना आल्हाद और जोश होता है)।
अब रहा सवाल इंडिया गेट के मोमबत्ती छाप मजमेबाजों का! सो ध्यान दें कि यह गैंग हमेशा आपको जेसिका लालों और मौजूदा प्रकरण जैसे मामलों में ही दिखाई देगा। बाकी समाज, देश-दुनिया से इन्हें कोई लेना-देना नहीं। दिल्ली पुलिस के जवानों! आप तो इन शिखंडियों से उचित ढंग निपटने में सक्षम हैं, तो देर किस बात  की। का चुप साधि रहा बलवाना?
अंत में एक सवाल जो जवाब किसी समाचारवीर खबरिये ने  ना ही उठाया, और ना ही अपनी और से कुछ प्रकाश डाला, किन्तु अनेक लोगों के दिमाग में घूम रहा है। हालाँकि सवाल उठाते मैं भी डर रहा हूँ, पर मन नहीं मान रहा - कि घर से दूर दिल्ली पढ़ने आई लड़की आधी रात को अपनी यार के साथ कौन सी फ़िजिओथिरेपि का अध्ययन कर रही थी? जबकि खबरिया चैनल  हमें बता रहे हैं कि उस लड़की के परिवार ने सारी जमा-पूंजी उसकी पढाई में लगा दी, और वह अपने परिजनों से वायदा करके दिल्ली पढ़ने आई थी कि पढाई पूरी करने के बाद पूरे परिवार का बौझ उठाएगी।