घर से दूर दिल्ली में पढ़ने वाली लड़की का अपने यार के साथ सिनेमा
देखकर आधी रात को लौटते समय बस में मौजूद गुंडों द्वारा बलात्कार.
यह समाचार पाकर बलात्कार करने वालों के प्रति मुझे अत्यंत
क्रोध और पीडिता के प्रति सहज करुणा व सहानुभूति उत्पन्न हुई। इस अपराध के लिए विधि द्वारा निश्चित वर्तमान दण्ड
पर्याप्त है। अतिउत्साही गधे पता नहीं क्यों फांसी-फांसी चिल्ला रहे हैं? सवा
अरब नागरिकों वाले देश में नित्य इससे कहीं अधिक जघन्य अपराध हो रहे हैं। क्या दिल्ली
से दूर होने वाला अपराध इंडियन पीनल कोड के अनुसार अपराध नहीं, अल्पवयस्क बच्चियों
के साथ दुराचार पर तो इनका खून कभी नहीं खौलता दिखाई दिया? खबरिया चैनलों को उनकी कोई परवाह है? असलियत
यह है भाई साब! कि दूर-दराज की खबरें तलाश करने में संसाधन चाहियें, मेहनत करनी
पड़ती है, खर्चा होता है। इसलिए दिल्ली/ एन सी आर में जितनी अधिक विभत्स
और जघन्य घटना घटती है, मीडिया की बांछे खिल जाती हैं, सौभाग्य से बिना खर्च,
घर के बिलकुल पास ऐसी न्यूज हाथ हाथ लगी है कि दो-तीन दिन की नौकरी इसी को जुगालते
पूरी हो जायेगी (कृपया गौर करें कि समाचार कितना भी दुखद क्यों न हो,
पर वर्णन करते समय खबरिया
चैनल के वाचक के स्वर में कितना आल्हाद और जोश होता है)।
अब रहा सवाल इंडिया गेट के मोमबत्ती छाप मजमेबाजों
का! सो ध्यान दें कि यह गैंग हमेशा आपको
जेसिका लालों और मौजूदा प्रकरण जैसे मामलों में ही दिखाई देगा। बाकी समाज, देश-दुनिया से इन्हें कोई लेना-देना
नहीं। दिल्ली पुलिस के जवानों! आप तो इन शिखंडियों से उचित ढंग निपटने में सक्षम हैं, तो देर
किस बात की। का चुप साधि रहा बलवाना?
अंत में एक सवाल जो जवाब किसी समाचारवीर खबरिये
ने ना ही उठाया,
और ना ही अपनी और से कुछ प्रकाश डाला, किन्तु अनेक लोगों के दिमाग में घूम रहा है।
हालाँकि सवाल उठाते मैं भी डर रहा हूँ, पर मन नहीं मान रहा - कि
घर से दूर दिल्ली पढ़ने आई लड़की आधी रात को अपनी यार के साथ कौन सी फ़िजिओथिरेपि
का अध्ययन कर रही थी? जबकि खबरिया चैनल हमें बता रहे हैं कि उस लड़की के परिवार ने सारी जमा-पूंजी उसकी पढाई में
लगा दी, और वह अपने परिजनों से वायदा करके दिल्ली पढ़ने आई थी कि पढाई पूरी करने के
बाद पूरे परिवार का बौझ उठाएगी।
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